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बेटी पढ़ाओ’ इस जर्जर भवन में

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*’बेटी पढ़ाओ’ इस जर्जर भवन में !*

_दरकती दीवारों और छज्जों के बीच बैठती हैं बेटियां_

@ विष्णुचन्द्र शर्मा खरसिया

‘बेटी-बचाओ बेटी-पढ़ाओ’ के लिए चयनित रायगढ़ जिले के खरसिया में स्थित लोकेशवरी गर्ल्स स्कूल जो पुत्री शाला के नाम से जानी जाती है, जिसकी नींव का पत्थर 29 अक्टूबर 1945 में मैडम डीएच बिस्को के हाथों रखा गया था, यह बिल्डिंग पूर्णरूपेण जीर्ण-शीर्ण हो चुकी है। यहां नगर-पालिका द्वारा अब भी स्कूल संचालित किया जाता है। परंतु शिक्षा के संस्कार लेने वाली बेटियां यहां जान हथेली पर रखकर बैठती हैं !

जी हां अंग्रेजों के जमाने से संचालित इस स्कूल की बिल्डिंग के रखरखाव की परवाह ना तो शिक्षा विभाग को है और ना ही नगर प्रशासन को। ऐसे में यह बिल्डिंग पूर्णतया जर्जर हो चुकी है। ताज्जुब है पालिका इसमें गर्ल्स हाई स्कूल तो लगातार संचालित कर रही है, परंतु बिल्डिंग की मरम्मत या फिर नवनिर्माण के लिए ना जाने किसका इंतजार कर रही है। या फिर यूं कहें कि नगर पालिका को यहां किसी बड़े हादसे के होने का इंतजार है ! यह तो इस देश का ही दुर्भाग्य है, कि जब तक कोई बड़ी अनहोनी ना हो जाए तो वहां पर किसी का ध्यान केंद्रित नहीं हो पाता !

_क्षत-विक्षत है हर कक्ष_

यहाँ लगभग 400 बेटियाँ पढ़ रही हैं। परंतु यह विद्या का मंदिर पूर्णरूपेण क्षत-विक्षत हो चुका है। ऐसे में ना तो लाइब्रेरी में रखी पाठ्यपुस्तके ही महफूज हैं और ना ही लैब में रखे प्रायोगिक सामान सुरक्षित हैं। आपको बता दें कि जर्जर होने के कारण कुछ क्लास रूम अनुपयोगी हो चुके हैं। जिसके चलते सीमित कक्षा में ही अधिक छात्राओं को पढ़ाने की बेबसी भी बनी हुई है। पद पर आते ही अपने कार्यालय और अट्टालिकाओं के निर्माण में करोड़ों फूंक देने वालों को अपना भविष्य गढ़ रही इन बेटियों की परवाह ना जाने क्यों नहीं हो रही।

_शेम-शेम दोनों दरवाजों में…_

यह लज्जाजनक बात है कि पाठशाला वह भी पुत्री-शाला के दोनों दरवाजों में नगर के बेशर्म लोगों ने अघोषित मूत्रालय बनाया हुआ है। स्कूल से ही सटी नगरपालिका ने एक ओर तो नोटिस बोर्ड लगाकर तथा इंदिरागांधी गेट बंद कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली है, परंतु दूसरी ओर पानी टंकी तथा मुख्यद्वार पर यह सिलसिला बदस्तूर जारी है। आपको यह भी बता दें कि मंत्री अमर अग्रवाल के कार्यक्रम की वजह से स्कूल के 2 क्लास रूम को तोड़ा तो जरूर गया था, परंतु इसका पुनर्निर्माण कराना आवश्यक नहीं समझा गया।

_यहां नियमित नहीं मिलता वेतन_

एक दौर था जब पालिका द्वारा सफाईकर्मियों की तनख्वाह छह माह रोककर दो माह की दी जाती थी, खैर अब तो ठेकेदारी का दौर है। परंतु अपनी आदत से ग्रसित पालिका गुरुजनों को भी इसी श्रेणी में आंकते हुए यह सिलसिला जारी रखे हुए है। ऐसे में यदि कोई शिक्षक या फिर शिक्षिका अपनी परेशानी व्यक्त करें तो छटनी की तलवार सर पर लटकते देख अपनी व्यथा प्रकट करने में भी असमर्थ हो जाते हैं।


 

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