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भारतीय राजनीति से अटल का कूच, अब लौटने की गुंजाइश नहीं

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कुछ अवसर ऐसे होते हैं जब किसी के बारे में कुछ भी कह पाना या लिख पाना सहज नहीं होता. विचारों का अंतरनाद भर आए टब में पानी के थपेड़ों की तरह कोरों से टकराता रहता है. अंतरमन में कहीं एक दुख पसरता महसूस होता है और फिर असहमतियां खोदी हुई मिट्टी की तरह गंध देने लगती हैं. अटल नहीं रहे. राजनीति में जिन लोगों के लिए सहमतियों असहमतियों के बावजूद एक सम्मान का स्थान रहा, वो अब नहीं हैं.

एक ऐसा व्यक्ति जिसके फिर जग उठने और बोल उठने का इंतज़ार मैंने 2004 से अबतक किया है, वो व्यक्ति उम्मीद की दीवारों को लांघकर व्योम में विलीन हो गया. अक्सर अपने ऐसे परिचितों से, जिनका ताल्लुक संघ या भाजपा से है, मज़ाक में कहा करता था कि एक दिन अटल बिहारी वाजपेयी ज़ोर से छींककर जाग उठेंगे. और कहेंगे कि गाड़ी निकालो, रेस कोर्स चलो. फिर देखना तुम्हारे आज के सेनापति अपने ही सबसे बड़े नायक के आगे परास्त खड़े नज़र आएंगे. इस चुहल को दोहरा पाने की गुंजाइश सदा के लिए खत्म हो गई है.

जिस घर मैं जन्मा, वहां पिता समाजवादी और मां राष्ट्रवादी राजनीति से जुड़ी रहीं. संघ से परिचय भी बचपन में ही हो गया. शाखा गया. गीत गाए. किशोरों की शाखा लगवाई. घोष सीखा. कबड्डी खेलने के बाद घर-घर घूमकर पत्रक बांटे और स्वदेशी का प्रचार किया. शिविरों में गया और संघ को और करीब से जाना. लेकिन जानने के इस क्रम में जो सबसे उत्प्रेरक बात थी, वो थी अटल जी के भाषण. डॉ मुरली मनोहर जोशी पिताजी के परिचित थे. लेकिन सबसे ज़्यादा प्यार पूरे परिवार में अटल जी ही किए जाते थे.

इस स्नेह की वजह थी उनकी ईमानदारी. उनका प्रभावशाली व्यक्तित्व. अद्वितीय भाषण कला. शब्दों का चयन और विचारधारा के प्रति उनकी निष्ठा. पसीने से लथपथ, हर तरह के मौसम और स्थान पर उसी सहजता से बोलने वाले अटल जी. मां सहमति और पिता असहमतियों के बावजूद उन्हें सुनते थे. हम अटल जी को सुनते हुए ऐसे ही बड़े हुए. जहां एक ओर खानपान, आचरण और परस्पर व्यवहार में संघ एक अति औपचारिक और सीमित जगह दिखता था, वहीं अटल जी के बारे में सुनी कहानियां- उनका खानपान, उनके मित्र, सबसे संवाद की सहजता हमेशा उनकी ओर और आकर्षित करती थी.

1990 में मैंने आठ साल की उम्र में अपना पहला राजनीतिक भाषण दिया. इसके बाद यह सिलसिला रुका नहीं. यहां तक कि अटल जी के मंच से भी दो बार भाषण देने का मौका मिला. सामने हज़ारों की भीड़ और मैं खुद में इस व्यक्ति को महसूस करते हुए भाषण देता रहता था. किसी ने मिनी अटल कहा तो किसी ने भविष्य का नेता. पर मेरे बालमन में अटल एक नायक थे और मैं उनका अनुसरणकर्ता. 1991 से लेकर 1993 तक हर वर्ष उनसे मिला. कभी दिल्ली के लाजपत नगर में शत्रुध्न सिन्हा के प्रचार के दौरान तो कभी रायबरेली, कानपुर में किसी जनसभा के समय या फुरसतगंज हवाईअड्डे पर उनकी अगवानी करते हुए. एक धोती-कुर्ता पहले छोटे से बालक को वो भी बालसुलभ कौतुहल से ही देखते थे और हंसकर पीठ थपथपाते थे.

1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के साथ-साथ दंगों के जो बिंब उभरकर आए उससे संघ का तिलिस्म टूटने लगा. संघ में भीतर तक कूट-कूटकर भरी जातिवादिता उसे और गहरा करती गई. अंबेडकर को पढ़ना शुरू किया तो भाजपा और संघ की सच्चाई प्याज़ के छिलकों की तरह उतरने लगी. पिता ने इस आग में घी डाला और समझाया कि कैसे कार्यकर्ताओं को खाद की तरह इस्तेमाल करने वाली यह पार्टी और संगठन केवल व्यापारियों, पंडितों और ठाकुरों की जागीर है. यहां समर्पण नहीं, पैसा बोलता है. यहां त्याग नहीं, गुरुदक्षिणा अहम है. 1994 में नौंवी क्लास में सरस्वती विद्या मंदिर का यह छात्र फिर राजकीय इंटर कालेज चला आया और संघ, भाजपा के लिए यहीं से उम्मीद जाती रही.

अबतक संघ और भाजपा से मैं दूर जा चुका था. कुछ राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पदाधिकारियों से मिलने जाता था. उनसे बहस करता रहता था. संघ के अंदर खोखली होती नैतिकताओं से लेकर जाति और कार्यकर्ता के महत्व पर सवाल उठाता रहा. इसी क्रम में 1999 का चुनाव आया. पिताजी के पुराने मित्र अरुण नेहरू रायबरेली आए तो सबसे पहले हमारे घर पहुंचे. उन्होंने कहा कि तुम्हें मेरे लिए प्रचार करना है. वो भाजपा प्रत्याशी थे. ऐसा ही वादा अमेठी से आकर संजय सिंह भी ले गए. दोनों कमल निशान पर चुनाव लड़ रहे थे. दोनों के लिए प्रचार किया. अटल जी से अंतिम मुलाकात इसी दौरान रायबरेली में उनकी रैली के मंच पर हुई. मेरे भाषण के बाद अटल जी मंच पर आए और उनका भाषण हम सबने सुना. हालांकि अगली शाम उसी मैदान में प्रियंका गांधी की रैली हुई और प्रियंका के भाषण ने चुनाव बदल दिया. अरुण नेहरू हार गए.

इसके बाद अटल जी प्रधानमंत्री थे और मैं उनका विरोधी. विनिवेश से लेकर निजीकरण तक मैं उनसे असहमत था. मुझे अटल जी की सरकार अपने मूल सिद्धांतों के खिलाफ जाती दिख रही थी. मुझे दिख रहा था कि जो नारे संघ ने स्वदेशी के नाम पर हमसे गली-गली लगवाए, जो गीत गाने को कहे और जिस देश को, उसके संसाधनों को मां समझकर पूजा करवाई, वो उसी के खिलाफ खड़ी है. तब से लेकर आजतक मैं भाजपा की राजनीति से सहमत नहीं हो सका. मुझे भाजपा में कांग्रेस का ही विस्तारीकरण दिखा. ऊपर से उनका सांप्रदायिक एजेंडा और असहमतियों को रौंदने की आज की प्रवृत्ति उसे और भी विकृत कर देती है.

अलग थे अटल

लेकिन यहां सवाल अटल जी का है. और अटल को समझने के लिए कुछ देर के लिए उन्हें प्रतिबद्धताओं के उस चश्मे से देखना होगा जिससे किसी भी कार्यकर्ता को देखा जाना चाहिए, फिर चाहे वो वाम का हो या दक्षिण का. अटल अपनी विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध रहे. ईमानदार रहे. लेकिन राजनीति के प्रति भी एक प्रतिबद्धता उनमें थी. देश और लोकतंत्र के प्रति भी थी. इसीलिए विचारधारा को आंगीकार करके आगे बढ़ते अटल दूसरी विचारधाराओं को सुनते रहे, उनसे सदा एक संवाद रखा. विपक्ष में रहते हुए भी पूरे सदन को सुना और पूरे सदन का विश्वास पाया. राजनीति में यह एक बड़ी बात है.

सिर पर इस्लामिक टोपी पहनने की बात हो, खान-पान में खुलेपन की बात हो, पाकिस्तानी कलाकारों का इलाज कराना या ईमानदार छवि के अधिकारियों को बचाना. वाजपेयी ऐसा बहुत कुछ करते रहे जो उनकी पार्टी के किसी और नेता के चरित्र में कभी शामिल नहीं रहा. उन्होंने संघ को भी सुना और संतुष्ट रखा लेकिन संघ के बाहर के नेताओं को भी पार्टी में जगह दी और मजबूत किया. राजनीति में समझौते करने पड़ते हैं और वो समझौते उन्हें भी करने पड़े. लेकिन ये समझौते और साथ लेकर चलने की गुंजाइश ही तो लोकतंत्र की ताकत है.

वाजपेयी अपनों के बीच अकेले थे क्योंकि वो परायों को अपनाने में पीछे नहीं रहे. जिन्हें अपनाय़ा उन्हें सम्मान भी दिया और स्थान भी. भाजपा में रहते हुए उनसे बार-बार कहा जाता रहा कि वो एक सही नेता हैं जो गलत पार्टी में हैं. ऐसा कई बार प्रतीत भी होता है. लेकिन भाजपा के अबतक के सबसे जनप्रिय कवि राजनीतिज्ञ ने बड़ा होकर भी पार्टी को कभी छोटा नहीं किया. संघ से कई असहमतियों के बावजूद संघ को इतना कमज़ोर नहीं किया कि वो उनपर आश्रित हो जाए. आज भाजपा और संघ एक व्यक्ति विशेष का कुर्ता और पजामा बन चुके हैं. उस आदमी को हटाते ही दोनों जमीन पर आ गिरने जैसे हैं.

किसी भी लोकतंत्र में स्मरणीय नायक वही बन पाते हैं जो टिम्बर के पेड़ों की तरह सीधे आकाश की ओर न भागें बल्कि आम के, पीपल के वृक्ष बनें. जिनमें झुकने की गुंजाइश हो. शालीनता और शर्म हो. जो भाषा और संवाद में एक बुनियादी नैतिकता बनाए रखें. जिनके पास एक मुंह हो तो दो कान भी हों. अटल अपनी विचारधारा को निभाते हुए कम से कम वो आम के पेड़ तो बने ही रहे. युद्ध के भी नियम होते हैं. उसकी भी एक नैतिकता होती है. आज अनेक असहमतियों के बावजूद अटल जी के प्रति सम्मान भी है और उनके जाने का दुख भी.

मौत के चुटकुले

दरअसल, दुनिया में कोई भी आलोचना से परे नहीं है. यह अपनी दृष्टि है कि आप उस बुरे से भी क्या भलाई ले पाते हैं. अटल की मृत्यु की खबर आने के बाद से ही शोक के साथ-साथ आलोचनाओं का भी ज्वार देखने को मिल रहा है. शोक देखता हूं तो पाता हूं कि हर राजनीतिक दल और विचारधारा के लोग उन्हें याद कर रहे हैं. सबसे आश्चर्यजनक है पाकिस्तान में उनके लिए शोक की लहर. लोग सीमाओं के आर-पार लोगों के आने-जाने की गुंजाइश पैदा करने वाले नेता को याद कर रहे हैं.

आलोचना भी हो रही हैं और होनी भी चाहिए. लेकिन आलोचना करते हुए अनैतिक हो जाना वही भूल है जिसके लिए हम अपने विरोधी को कोसते हैं. अगर हमारी आलोचना की भाषा हमें फासीवादी बना रही है तो बेहतर है कि चुप रहा जाए. अटल के सामने भले ही हम एक असहमत समाज हों लेकिन इतना तो सीख ही सकते हैं कि विचारधारा और देश को कैसे निभाया जा सकता है. कैसे वो गुंजाइश रखी जा सकती है जो आज न तो भाजपा में है और न ही कांग्रेस में. वामदलों में भी नहीं.

विचारधाराओं की कई डालियों पर अबतक उड़ता हुआ मैं बार-बार पहुंचा हूं. कूपमंडूकता हमारे समय की राजनीति का सच है. हर ओर खेमेबाज़ी है, हर ओर संवादहीनता का नशा. वाम वाले अपने खेमे में भाषण देकर खुश हैं. कांग्रेस वाले किसी नए को अपना नहीं पा रहे. भाजपा के लिए तो वे हैं ही नहीं जो उनके नहीं हैं. अगर हैं तो देशद्रोही हैं, दुश्मन हैं. इसीलिए चाह कर भी किसी का हो नहीं सका. लपकना सबने चाहा, लेकिन मैं कुंए में जानबूझकर गिरा नहीं.

वाजपेयी होना राजनीति में इसी गुंजाइश का बचा होना है. वाजपेयी का जाना भारतीय राजनीति से उसी गुंजाइश का निर्वाण है. राजनीतिक दलों को अब अपने अंदर के वाजपेयी खोजने होंगे ताकि प्रतिबद्धताएं भी बची रहें और लोकतंत्र भी. लोकतंत्र- संगठन का भी और देश का भी

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