Home Breaking News कैसे अचानक ख़त्म हो गया किसान आंदोलन? किसने निभाई अहम भूमिका

कैसे अचानक ख़त्म हो गया किसान आंदोलन? किसने निभाई अहम भूमिका

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भारतीय किसान यूनियन की अगुआई में शुरू हुआ किसान आंदोलन 02 और 03 अक्टूबर की मध्यरात्रि में बेहद शांतिपूर्ण तरीके से ख़त्म हो गया. यह आंदोलन उग्र रूप भी ले सकता था. इसके चलते दिल्ली-एनसीआर की जनता को तमाम मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता था. और साथ ही केंद्र की मोदी सरकार के लिए भी एक नई परेशानी सामने आ सकती थी. विपक्ष को बैठे बिठाए नया मुद्दा मिल सकता था. किसानों के आंदोलन की मूलभूत वजहों को कहीं पीछे छोड़ कर आगामी चुनावों को देखते हुए एंटी मोदी तबका इसे एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर सकता था.

लेकिन यह सब बातें जो हो सकती थी वो नहीं हुई. इस सब न होने के पीछे कुछ ऐसे कारक, किरदार हैं जिन्होंने बेहद सूझबूझ से काम लिया. और पूर्व में हुए तमाम किसान आंदोलनों की भयावहता, नकारात्मक राजनीति, हिंसक घटनाओं से सबक लिया. आपको बताते हैं कि कौन हैं वो किरदार जिन्होंने इस आंदोलन को शांतिपूर्ण तरीके से ख़त्म करने के लिए रोल अदा किया

केंद्र सरकार
केंद्र सरकार ने वक्त रहते मौके कि नज़ाकत को समझा और तत्काल प्रभाव से हरकत में आयी. सरकार ने कुछ मांगों को माना है कुछ के लिए वक्त मांगा है. भले ही भाकियू का यह आरोप है कि सरकार किसान विरोधी है. लेकिन केंद्र सरकार की तत्काल प्रतिक्रिया और किसानों से संवाद का असर यह रहा कि इस आंदोलन में नरमी आयी. गृहमंत्री राजनाथ सिंह के आवास पर बैठक के बाद मंगलवार शाम केंद्रीय केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत,  उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री सुरेश राणा और लक्ष्मी नारायण आंदोलन स्थल पर पहुंचे, यहां सुरेश राणा को किसानों के विरोध का भी सामना करना पड़ा. वहीं लक्ष्मी नारायण ने कहा कि किसानों के प्रस्तावों पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि किसानों के साथ नाइंसाफी बर्दाश्त नहीं की जाएगी. विपक्षी दल जब तक राजनीति के तहत कुछ करते उससे पहले ही केंद्र सरकार कि सूझबूझ ने इस आंदोलन को न्यूट्रल करने में कामयाबी पा ली.

गजेंद्र सिंह शेखावत
गृहमंत्री राजनाथ सिंह के साथ वार्ता के बाद किसानों के बीच सरकार का जवाब लेकर पहुंचे केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने किसानों को हर संभव मदद का आश्वासन दिया. उन्होंने किसानों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वह वादा याद दिलाया जिसमें उन्होंने किसानों को देश में सबसे मजबूत बनाने की बात कही थी. केंद्रीय कृषि मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा कि किसानों की जीएसटी की मांग हो या दस साल पुराने वाहनों को बंद न करने की मांग, केंद्र सरकार उनकी सभी मांगों के प्रति सकारात्मक रुख अपनाए हुई है. जो मामले संवैधानिक हैं उन्हें कोर्ट में केस लड़कर सरकार सुलझाने का प्रयास करेगी. अन्य मांगों पर अगले तीन माह में कार्रवाई की जाएगी. उन्होंने कहा कि वर्तमान सरकार किसानों की सरकार है.

योगी आदित्यनाथ
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी किसानों और उनके मुद्दों को नजरअंदाज न करते हुए 01 अक्टूबर की रात में ही किसानों के प्रतिनिधि मंडल से हिंडन एयरबेस पर मुलाक़ात की. हालांकि यह मुलाक़ात बेनतीजा रही लेकिन योगी आदित्यनाथ यह सन्देश देने में सफल रहे कि सरकार को किसानों की चिंता है और उनसे बात करना उनकी समस्याओं को सुनना और समझना चाहती है. उस रत किसानों ने अपना मांग पत्र मुख्यमंत्री के सामने रखा और किसानों की समस्या के बारे में अवगत कराया. जिस वक्त किसान गाजियाबाद में आंदोलन कर रहे थे और दिल्ली की तरफ को कूच कर रहे थे उसी वक्त उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को हिंडन एयर बेस से लखनऊ के लिए उड़ान भरनी थी इसी बीच गाजियाबाद प्रशासन के बड़े अधिकारियों पर इस बात की सूचना आई के मुख्यमंत्री किसानों के प्रतिनिधिमंडल से मिलना चाहते हैं कुछ ही देर में जिला प्रशासन ने किसानों को मनाया और करीब 15 लोगों को मुख्यमंत्री साहब से मिलवाने के लिए हिंडन एयरबेस ले गए.

नरेश टिकैत
भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) के अध्यक्ष नरेश टिकैत को भी इसका श्रेय जाता है. उन्होंने इस आंदोलन को एंटी मोदी तत्वों का हथकंडा नहीं बनने दिया. नरेश टिकैत ने देर रात खुद बयान दिया कि हमारा उद्देश्य किसान घाट पर पुष्पांजलि के साथ किसान यात्रा को ख़त्म करना था. इसलिए अब हम लौट रहे हैं. मंगलवार रात हजारों किसान अपने ट्रैक्टर पर सवार होकर किसान घाट पहुंचे और चौधरी चरण सिंह की समाधि पर फूल चढ़ाकर इस यात्रा को खत्म कर दिया गया.

दिल्ली पुलिस
दिल्ली पुलिस ने कुशल रणनीति, जिम्मेदारी दिखाते हुए कल सुबह से ही किसानों को दिल्ली-यूपी बॉर्डर पर रोके रखा. और सबसे अच्छा कदम यह रहा कि आधी रात के बाद उन्हें किसान घाट जाने की अनुमति दे दी. दिल्ली पुलिस के इस कदम से किसान नेताओं को भड़कने का मौका भी नहीं मिला और सबसे बड़ी बात कि आज 03 अक्टूबर का दिन शुरू होने से पहले ही आंदोलन को ख़त्म किये जाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया. यदि ऐसा न होता तो आज का दिन शुरू होने से पहले स्थिति बेहद परेशान करने वाली हो सकती थी. इसके अलावा पुलिस ने जो चुस्त दुरूस्त व्यवस्था की उससे इस आंदोलन में शामिल उत्पाती प्रवृत्ति के तत्वों को मनोवैज्ञानिक तरीके से काबू पाने में सफलता मिली. पुलिस ने 3 हज़ार जवान लगाए थे कि किसान दिल्ली-यूपी बॉर्डर से आगे बढ़ ना सकें. पुलिस एक्शन पर जवाब यही दिया गया कि भीड़ को मैनेज करने के लिए जो न्यूनतम फोर्स की ज़रूरत थी वही इस्तेमाल की गई. पुलिस का कहना है कि प्रदर्शन के हिंसा में बदलने से उनके भी 7 जवान घायल हुए. यदि यही किसान पैदल दिन के वक्त किसान घाट जाने में सफल हो जाते तो इसका गलत प्रभाव पड़ सकता था.

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